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लहज़ा

January 30, 2017 drhcpathak 0

इमेजिन के धारावाहिक ‘बंदिनी’ के पात्रों में धर्मराज महियावंशी की भाषा में ठेठ गुजराती का असर दिखाई देता है। इसी चैनल के देवी, जमुनिया, काशी […]

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शैली

January 27, 2017 drhcpathak 0

खड़ीबोली के जो संज्ञा, विशेषण व कियापद आकारांत उच्चरित होते हैं, वे ब्रज, कन्नौजी आदि कुछ बोलियों में ओकारांत हो जाते हैं; जैसे – एक […]

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संप्रेषणीयता

January 25, 2017 drhcpathak 0

देश के बहुभाषाभाषी तथा विविध स्तरों के दर्शकों के लिए बनने वाले हिन्दी धारावाहिकों की भाषा में अधिकतम संप्रेषणीयता को ध्यान में रखते हुए तत्सम […]

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लिपसांग

January 23, 2017 drhcpathak 0

जब साहित्य की बात होती है, तो अतुकांत कविता के समर्थक कविता का मूल्य उसके भाव से आंकते हैं। उनका तर्क है कि भाव सोने […]

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साहित्य

January 20, 2017 drhcpathak 0

भाषा केवल संप्रेषण के सामाजिक उद्देश्यों की पूर्ति ही नहीं करती, वरन् अपने बोलने वालों की वैचारिक विरासत को भी सुरक्षित रखती है। एक ओर […]

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अपशब्द

January 18, 2017 drhcpathak 0

दरअसल शब्द देह होता है और अर्थ उसका चरित्र। चरित्र की दृष्टि से जिस तरह हमारे समाज में कुछ लोग ऐसे होते हैं, जिन्हें सामान्यत: […]

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परिचय गीत

January 16, 2017 drhcpathak 0

हिंदी फिल्मों की संरचनात्मकता में समय के साथ कई परिवर्तन हुए, पर आलमआरा ( 1931) से प्रारंभ गीत नृत्य की परंपरा आज भी यथावत् है। […]

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अभिनव

January 13, 2017 drhcpathak 0

पुराने हिन्दी फिल्मी गीत अपनी जिस भावप्रवणता के कारण मन में घर कर जाते थे, उसमें उत्तरोत्तर कमी आती जा रही है। इसका कारण केवल […]

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गीतों की भाषा

January 11, 2017 drhcpathak 0

हिन्दी फिल्मों के माध्यम से एक ओर यदिसाहित्य की दृश्य विधाएंं नूतन एवं विशद होती रही हैं, तो दूसरी ओर फिल्मी गीतों के माध्यम से […]

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मेरे बारे में :

January 9, 2017 drhcpathak 0

डॉ0 हरिश्चन्द्र पाठक 1. शिक्षा : एम.ए. – हिन्दी (1967) , डी.फिल्.- भाषाविज्ञान (इलाहाबाद विश्वविद्यालय) 2. अध्यापन : तीस वर्ष – राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय – […]

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