गीतों की भाषा

giton

हिन्दी फिल्मों के माध्यम से एक ओर यदिसाहित्य की दृश्य विधाएंं नूतन एवं विशद होती रही हैं, तो दूसरी ओर फिल्मी गीतों के माध्यम से आम आदमी की असंख्य भावनाएं भी मूर्त एवं मुखरित होती रही हैं। यही कारण है कि आज हिन्दी की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में फिल्मों से संबंधित स्तंभ अवश्य होता है। कुछ पत्रिकाएं तो केवल फिल्मों पर ही आधारित होती हैं।

जहां तक हिन्दी फिल्मी गीतों की भाषा का प्रश्न है, उसे हिन्दी की सभी बोलियों के शब्दों का योगदान तो प्राप्त होता ही रहा है, अन्य भारतीय आर्यभाषाओं एवं दक्षिण भारतीय भाषाओं के साथ-साथ विदेशी भाषाओं की शब्दावली का सहयोग भी मिला है। बहुभाषाभाषी तथा विविध स्तरों के दर्शकों के लिए अधिकतम संप्रेषणीयता को ध्यान में रखते हुए तत्सम शब्दों की अपेक्षा लोक प्रचलित तद्भव, देशी और विदेशी शब्दों का प्रचुर प्रयोग किया जाता है।

हिन्दी फिल्मी गीतों का लगातार बढ़ता हुआ खजाना घरों, दुकानों, गलियों, बस्तियों, गांवों, कस्बों, शहरों व महानगरों की दिनचर्या के अलावा कारों, जीपों, बसों, ट्रकों की यात्रा में घुल-मिल चुका है। हर चीज की तरह इसके भी फायदे या नुकसान गिनाए जा सकते हैं, पर यह देश के हिन्दी भाषी और अहिन्दी भाषी भागों में सम्यक् रूप से भाव एवं भाषा की एकरूपता का अश्वमेध अवश्य कर रहा है।
उदाहरण :
हम तुम पे इतना डाइंग, जितना सी में पानी लाइंग
आकाश में पंछी फ्लाइंग, भंवरा बगियन में गाइंग

गीतकार – मजरूह सुल्तानपुरी (फिल्म – खुद्दार)

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