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कहानी एवं सिनेमा

June 18, 2017 drhcpathak 0

कहानी में आस्वादन के दो पक्ष होते हैं – लेखक एवं पाठक अथवा वक्ता तथा श्रोता, जब कि सिनेमा मेंतीन पक्ष – लेखक, दर्शक व […]

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प्रेमचंद

June 4, 2017 drhcpathak 0

हिंदी कथासाहित्यकारों में प्रेमचंद की रचनाओं पर सबसे ज्यादा फिल्में बनीं, क्योंकि अपनी रचनाओं में उन्होंने केवल देश की आजादी की आकांक्षा ही अभिव्यक्त नहीं […]

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साहित्य व सिनेमा :

May 21, 2017 drhcpathak 0

मनोरंजन एवं ज्ञानवर्धन के नाम पर आज के आम आदमी को विभिन्न श्रव्य दृश्य माध्यमों ने इस प्रकार घेर लिया है कि उसे पुस्तकें या […]

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संभावना :

May 8, 2017 drhcpathak 0

अनेक फिल्मी किरदारों में अपनी अस्मिता की तलाश करती नायिकाओं की विभिन्न भावनाओं को अभिव्यंजित करने के साथ साथ आज की अभिनेत्रियां फिल्म निर्माण और […]

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विद्रोह :

May 1, 2017 drhcpathak 0

1985 में ‘मिर्च मसाला’ की नायिका गांव के ऐयाश सूबेदार के विरूद्ध भी औरतों को संगठित करती है। 1987 में ‘प्रतिघात’ की नायिका अपने पति […]

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समस्या :

April 24, 2017 drhcpathak 0

1959 में ‘सुजाता’ में बड़ी जाति के परिवार द्वारा गोद ली गई छोटी जाति की लड़की की विवशता दिखाई देती है। 1960 में ‘मुगल ए […]

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स्वतंत्रता

April 17, 2017 drhcpathak 0

1941 से 1947 तक जंगल की लड़की, जंगल प्रिंसेज, जंगल गॉडेस, सरकस की सुंदरी, सरोवर की सुंदरी, लेडी रॉबिनहुड, खंजरवाली, बंदूकवाली, हिम्मतवाली, सिल्वर क्वीन, स्पीड […]

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विषय :

April 11, 2017 drhcpathak 0

जिन दिनों सवाक् फिल्मों का बनना शुरू हुआ, उन दिनों हमारे समाज में बालविवाह, विधवा उपेक्षा, जाति भेद और छुआछूत की भावना का दौर था। […]

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नायिका

April 6, 2017 drhcpathak 0

विगत शताब्दी में हिंदी सिनेमा ने भाव और भाषा की कलात्मक यात्रा में अग्रसर होते हुएअपनी बहुआयामी उपयोगिता सिद्ध की है। इस यात्रा के प्रारंभिक […]

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ध्वनि की भाषा

March 27, 2017 drhcpathak 0

यूं तो दृश्य विधाओं में नेपथ्य संगीत का प्रयोग नौटंकी के जमाने से जारी है। इससे प्रस्तुति का प्रभाव ही नहीं बढ़ता, दर्षक की एकाग्रता […]

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